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"राइट टू रिपेयर" आंदोलन की गूंज

ओंकार सिंह जनौटी
१२ जनवरी २०१९

वॉरंटी खत्म होते ही नई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस खराब हो गई. रिपेयरिंग भी नहीं हो सकी. यूरोप और अमेरिका में अब मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर "राइट टू रिपेयर" की लगाम कसने की तैयारी हो रही है.

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OLED TV Samsung
तस्वीर: dapd

यूरोपीय संघ और अमेरिका के पर्यावरण संगठनों ने इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों की मनमानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. वे "राइट टू रिपेयर" यानि मरम्मत करने का अधिकार की मांग कर रहे हैं. यूरोपीय संघ के कई देशों के पर्यावरण मंत्री मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को इससे जुड़े प्रस्ताव भेज चुके हैं. प्रस्तावों में कहा गया है कि निर्माता ऐसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाएं जो लंबे समय तक चलें और आसानी से रिपेयर किए जा सकें.

प्रस्ताव लाइटिंग, टेलिविजन और लार्ज होम एप्लाइंसेस बनाने वाली कंपनियों को भेजे गए हैं. अमेरिका में भी 18 राज्य राइट टू रिपेयर जैसा कानून लागून करने पर विचार कर रहे हैं.

मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अब तक यूरोपीय संघ के प्रस्तावों का विरोध करती आई हैं. कंपनियों का कहना है कि रिपेयरिंग से जुड़े प्रस्तावित कानून बहुत सख्त हैं और इनसे नई खोजों में बाधा पड़ेगी.

Symbolbild Mann im einem Waschsalon
बहुत जल्दी खराब हो रहे हैं इलेक्ट्रिक उपकरणतस्वीर: Colourbox/B. Preve

वहीं ग्राहक अधिकारों की वकालत करने वालों का आरोप है कि यूरोपीय संघ रिपेयरिंग के मामले में मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर नर्म रुख दिखा रहा है. एक प्रस्ताव के मुताबिक कुछ प्रोडक्ट्स को सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के प्रशिक्षित कामगार ही रिपेयर करेंगे. यूरोपीय पर्यावरण ब्यूरो (ईईबी) के मुताबिक, "इसकी वजह से स्वतंत्र मैकेनिक स्पेयर पार्ट्स और जानकारी हासिल नहीं कर सकेंगे. इससे संभावनाएं और किफायती मरम्मत की सीमाएं सीमित होंगी." स्मार्टफोन, टैबलेट और स्क्रीन को भी इसमें शामिल किए जाने की मांग हो रही है.

एक शोध के मुताबिक 2004 में घरेलू कामकाज की 3.5 फीसदी इलेक्ट्रॉनिक मशीनें पांच साल बाद खराब हो रही थीं. 2012 में यह खराबी का अनुपात बढ़कर 8.3 फीसदी हो गया. रिसाइक्लिंग सेंटरों में 10 फीसदी से ज्यादा ऐसी वॉशिंग मशीनें आईं, जो पांच साल से पहले ही खराब हो गईं. यूरोप में बिकने वाले कई लैंपों में बल्ब बदलने का विकल्प नहीं है. एक बल्ब के खराब होते ही पूरा लैंप बदलना पड़ता है.

(मुसीबत बना ई कचरा​​​)

एक अनुमान के मुताबिक 2018 में दुनिया भर में 5 करोड़ टन ई-कचरा जमा हुआ. इस कचरे में कंप्यूटर प्रोडक्ट्स, स्क्रीन्स, स्मार्टफोन, टैबलेट, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और हीटिंग या कूलिंग वाले उपकरण सबसे ज्यादा थे. इसमें से सिर्फ 20 फीसदी कचरे की रिसाइक्लिंग हुई, बाकी खुली जमीन या नदियों और समंदर तक पहुंच गए. उत्पादन और कचरा प्रबंधन में बहुत ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है. कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में हानिकारक रसायन भी होते हैं जो जमीन और भूजल को भी दूषित करते हैं.

इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा करने के मामले में भारत दुनिया का पांचवा बड़ा देश है. भारतीय शहरों में पैदा होने वाले इलेक्ट्रॉनिक कचरे में सबसे ज्यादा कंप्यूटर होते हैं. ऐसे ई कचरे में 40 फीसदी सीसा और 70 फीसदी भारी धातुएं मिलीं.